मंदिर के बारे में

आदिशक्ति माँ भुवनेश्वरी सिद्धपीठ, सांगुड़ा, बिलखेत पौड़ी गढ़वाल

वर्ष 1757 मे माँ की पिंडी मातृलिंग की स्थापना श्री उत्सव सैलवाल जी द्वारा किया गया आज भी उनके वंशज मुख्य पुजारी-आचार्य नागेंद्र मोहन सैलवाल जी अनवरत माँ भुवनेश्वरी जी की सेवा मे सेवारत है।

स्थापना, इतिहास और महत्व

आदिशक्ति माँ भुवनेश्वरी मंदिर सिद्धपीठ उत्तराखंड के राष्ट्रीय राजमार्ग ११९ पर कोटद्वार-पौड़ी के मध्य कोटद्वार से लगभग ५४ कि०मी० तथा पौड़ी से ५२ कि०मी० की दूरी देवप्रयाग से ३५ कि0मी0 की दूरी सतपुली से बाँघाट, व्यासचट्टी,देवप्रयाग मार्ग पर लगभग ८ कि0 मी0 की दूरी पर प्राकृतिक सौंदर्य भव्यता से परिपूर्ण एक छोटे से कस्बे सांगुड़ा बिलखेत तिल्या मे स्थित है। लोकश्रुतियों के अनुसार पूर्व समय में जब विदेशी आक्रमणकारियों ने पूजास्थलों को अपवित्र और खण्डित किया तो पांच देवियों ने वीर भैरव के साथ केदारखण्ड (गढ़वाल) की तरफ प्रस्थान किया। मां आदिशक्ति भुवनेश्वरी, मां ज्वाल्पा, मां बाल सुन्दरी, मां बालकुंवारी और मां राजराजेश्वरी अपनी यात्रा के दौरान नजीबाबाद पहुंची। नजीबाबाद उस समय बड़ी मण्डी हुआ करती थी। सम्पूर्ण गढ़वाल क्षेत्र के लोग उस समय अपनी आवश्यकता के सामान के लिये नजीबाबाद आया करते थे। पौड़ी जनपद के मनियारस्यूं पट्‌टी, ग्राम सैनार के नेगी बन्धु भी नजीबाबाद सामान लेने आये हुये थे। मां भुवनेश्वरी मातृलिंग के रूप में उनके नमक की बोरी में प्रविष्ट हो गईं। अपना-अपना सामान लेकर नेगी बन्धु वापसी में कोटद्वार - दुगड्‌डा होते हुये ग्राम सांगुड़ा पहुंचे। सांगुड़ा में श्री भवानी सिंह नेगी जी ने देखा कि उनकी नमक की बोरी में एक पिण्डी है जिसको उन्होने पत्थर समझकर सांगुड़ा नामक स्थान मे फेंक दिया। रात्रि को मां भुवनेश्वरी ने श्री भवानी सिंह नेगी को स्वप्न में दर्शन दिये और आदेश दिया कि मां के मातृलिंग को सांगुड़ा में स्थापित किया जाय। तत्पश्चात विधि-विधान पूर्वक मन्त्रोच्चार सहित मां की पिण्डी की स्थापना सांगुड़ा में की गई। मन्दिर की स्थापना हेतु थोकदार मनियारी रावत ग्राम -धारी के मनियारी रावत बंधुओं ने अपनी भूमि माँ के मंदिर के निर्माण के लिए अर्पित की तब से मनियारी रावत माँ के ससुराल पक्ष एवम नेगी लोग मायके पक्ष के माने जाते है। एवम सैलवाल जाति के लोग माँ के पुजारी है। वर्ष 1757 मे माँ की पिंडी मातृलिंग की स्थापना श्री उत्सव सैलवाल जी द्वारा किया गया आज भी उनके वंशज मुख्य पुजारी-आचार्य नागेंद्र मोहन सैलवाल जी अनवरत माँ भुवनेश्वरी जी की सेवा मे सेवारत है। माता भुवनेश्वरी देवी को नैथानी,नौटियाल, कंडवाल, ममगांई जुयाल आदि आदि जातियों के लोग माँ भुवनेश्वरी को कुलदेवी के रूप मे पूजा करते है। खूबसूरत घाटी में अवस्थित सांगुड़ा में श्री भुवनेश्वरी सिद्धपीठ का अवलोकन करने पर एक ओर नयार और दूसरी ओर हरे भरे खेत, लहलहाती फसलें, सामने के दृश्य में पहाड़ियां इस धार्मिक स्थल को अनुपम सौन्दर्य प्रदान करती हैं। समय की आवश्यकता अनुसार मंदिर का जीर्णोद्धार सभी भक्तो के सहयोग से समय समय पर होता रहा है। माता भुवनेश्वरी मंदिर ग्राम धारी, कुण्ड, पंचाली,गड़कोट पुन्डोरी बिलखेत, दैसंण, नैथाणा,सैली, सैनार, गोरली भेंटुली,आदि गांवों का प्रमुख मन्दिर है। इस मन्दिर में मकर संक्रांति के अवसर पर लगने वाला गेंद का मेला (गिन्दी कौथीग) बहुत प्रसिद्ध है। श्रद्धालुओं हेतु मन्दिर वर्ष भर खुला रहता है, इस स्थान के मनोरम वातावरण तथा अनुपम सौन्दर्य का अवलोकन कर भक्त मंत्रमुग्ध हो जाता है।मन्दिर परिसर में श्रद्धालुओं के ठहरने हेतु एक धर्मशाला है भोजन जलपान की व्यवस्था का उचित प्रबंध है। मन्दिर के आस-पास होटल, रेस्टोरेन्ट्‌स में ठहरने एवं जलपान आदि की सुविधा आसानी से मिल जाती है।

देवता की जानकारी (कथा, पौराणिक महत्व)

देवी दस महाविद्याओं में से चतुर्थ महाविद्या हैं। उन्हें सृष्टि देवी अर्थात सम्पूर्ण सृष्टि की अधिष्ठात्री के रूप में भी जाना जाता है, जो स्वयं सपूर्ण सृष्टि के रूप में विद्यमान हैं। अपने नाम के अनुरूप ही देवी भुवनेश्वरी समस्त लोकों की महारानी हैं तथा सम्पूर्ण सृष्टि पर शासन करने वाली हैं। वह विभिन्न लक्षणों में देवी त्रिपुर सुन्दरी के समान हैं।

भुवनेश्वरी देवी उत्पत्ति- देवी भुवनेश्वरी को आदि शक्ति के रूप में जाना जाता है, जो शक्ति के अति प्राचीन रूपों में से एक हैं। देवी भुवनेश्वरी के सगुण स्वरूप को देवी पार्वती के रूप में जाना जाता है। हिन्दु पञ्चाङ्ग के अनुसार, भुवनेश्वरी जयन्ती भाद्रपद शुक्ल द्वादशी को मनायी जाती है।

भुवनेश्वरी स्वरूप वर्णन-देवी भुवनेश्वरी का स्वरूप देवी त्रिपुर सुन्दरी के समान है। देवी का वर्ण उगते सूर्य के समान है एवं वह अपने केशों में अर्धचन्द्र धारण करती हैं। देवी भुवनेश्वरी को चतुर्भुज धारी रूप में त्रिनेत्र धारण किये हुये दर्शाया जाता है। उनके दो हाथ अभय मुद्रा एवं वरद मुद्रा में हैं तथा शेष दो हाथों में देवी अंकुश एवं पाश (रस्सी का फन्दा) लिये रहती हैं।

भुवनेश्वरी साधना-भुवनेश्वरी साधना समस्त प्रकार के भौतिक सुखों की प्राप्ति हेतु की जाती है। सन्तान, धन, ज्ञान तथा सौभाग्य प्राप्ति हेतु देवी की आराधना की जाती है। भुवनेश्वरी आदि पराशक्ति शाकम्भरी नाम से प्रसिद्ध संबंध-महाविद्या, देवी निवासस्थान-मणिद्वीप अस्त्र-पाश अंकुश अभय और बरद मुद्रा जीवनसाथी-भुवनेश्वर भैरव सवारी-कमल।

पुजारी/संस्थापक का परिचय

आदिशक्ति माँ भुवनेश्वरी देवी के आदेशानुसार वर्ष 1757 मे सैलवाल जाति के ब्राह्मणों को माँ की पिंडी की स्थापना एवम पूजा अर्चना सेवा का दायित्व माँ भुवनेश्वरी के आदेशानुसार प्राप्त हुआ।
वर्ष 1757 मे सर्वप्रथम उत्सव सैलवाल जी द्वारा माँ भुवनेश्वरी की पिंडी मातृलिंग की स्थापना की गई थी तब से निरन्तर उनके वंश परम्परा द्वारा माँ की पूजा अर्चना सेवा की जा रही है।

वंश परम्परा के अनुसार माँ भुवनेश्वरी देवी के पुजारियों की वंशावली-
1-उत्सव सैलवाल
2-बूथराम सैलवाल
3-दलपाराम सैलवाल
4-परमानन्द सैलवाल
5-राजेन्द्र प्रसाद सैलवाल

वर्तमान पीठाधीश-गणेश प्रसाद सैलवाल
मुख्य पुजारी-नागेंद्र मोहन सैलवाल